मुज़फ्फरपुर. आप भी अगर कभी मुक्तिधाम गए होंगे, तो वहां पिछड़े तबके के कुछ वंचित बच्चे आपको दिखाई दिए होंगे. लेकिन आपने इनके बारे में क्या सोचा? बिहार के मुज़फ्फरपुर स्थित एक मुक्तिधाम में चिताएं तो जलती ही हैं, बच्चों की शिक्षा की अलख भी जल रही है. कुछ युवक मिलकर यहां 100 से भी ज़्यादा वंचित बच्चों का भविष्य संवारने के लिए रोज़ाना घंटों का समय देते हैं. चिताओं के करीब ही मुक्तिधाम परिसर में 3 घंटे स्कूल चलता है और यहां 100 से ज़्यादा बच्चे एकदम मुफ्त में शिक्षा पाते हैं. मुक्तिधाम में इस पाठशाला के पीछे एक रोचक कहानी है.
दरअसल, सिकंदरपुर मुक्तिधाम में सुमित पहली बार अपने मित्र के दादाजी का अंतिम संस्कार करने गए थे. मुक्तिधाम में सुमित ने देखा दर्जनों बच्चे शव के पास रखे बताशें, जलेबी और कपड़े लूटने में लगे थे. सुमित यह सब देख हैरान विचलित हुए. रहा नहीं गया तो बच्चों से पढ़ाई के बारे में पूछ लिया. बच्चों से जवाब मिला कि वे पढ़ाई नहीं करते सिर्फ घूमते हैं. तभी सुमित के ज़ेहन में इन बच्चों को मुफ्त में पढ़ाने की ठानी और यह सिलसिला चल पड़ा. सुमित अपने साथियों के साथ मुक्तिधाम प्रांगण में ही नियमित पढ़ाते हैं.
ऐसी चलती है यह अप्पन पाठशाला
इस पाठशाला का नाम सुमित ने अप्पन पाठशाला रखा, ताकि बच्चों को इससे जुड़ाव महसूस हो सके. इस पाठशाला में 100 से अधिक बच्चे रोज पढ़ने आते हैं. रोज़ाना शाम 4 से 7 बजे तक इस पाठशाला में क्लास लगती है. सुमित बताते हैं कि बच्चों की संख्या हर महीने बढ़ती घटती रहती है. जो बच्चे नियमित नहीं आते हैं, उनका नाम काट दिया जाता है और उन्हें फिर पुख्ता ढंग से जोड़ने के लिए उनके परिवार से बातचीत की जाती है.
अप्पन पाठशाला को चलाने में सुमित के मित्र सुमन सौरभ और अभिराज कुमार साथ देते हैं. सुमित ने बताया पहले जो बच्चे यहां आते थे, वे बहुत कम पढ़-लिख पाते थे. अब अप्पन पाठशाला से जुड़कर बच्चों की रुचि पढ़ाई में बढ़ी है. अप्पन पाठशाला में पढ़ने वाली 11 साल की सिद्धि बताती हैं कि वह 6 साल से यहां पढ़ रही हैं और डॉक्टर बनना चाहती हैं. 12 वर्ष की सोनाक्षी सातवीं कक्षा में पढ़ती है और आर्मी में जाने का सपना रखती है. अप्पन पाठशाला ऐसे ही सैंकड़ों बच्चों के सपनों को बुनने का काम निरंतर कर रही है.




