मुजफ्फरपुर : किसी भी चुनाव में उम्मीदवारों की नजर अपने वोटरों पर रहती है। वे आकलन करते हैं कि उन्हें इतने वोट मिल जाने पर जीत तय हो जाएगी, मगर कुढ़नी विधानसभा क्षेत्र में स्थिति थोड़ी अलग रहती है। यहां उम्मीदवार जोड़-घटाव करते हैं कि विरोधी के कितने वोट कट रहे। इसके आधार पर ही जीत और हार तय मानी जाती है।
पिछले चुनाव में महज 712 वोटों से भाजपा उम्मीदवार केदार गुप्ता की हार का यही कारण रहा। जदयू के साथ रहते हुए भी रालोसपा के राम बाबू सिंह ने 10 हजार से अधिक वोट काट लिए। इनमें अधिकतर वोट जदयू के परंपरागत कुशवाहा के थे, जो भाजपा उम्मीदवार को नहीं मिले।
वर्ष 2015 के चुनाव को छोड़ दें तो 2010 की कहानी भी कमोबेश यही थी। तब कांग्रेस उम्मीदवार शाह आलम शब्बू ने 12 हजार से अधिक वोट काटकर मनोज कुशवाहा की महज डेढ़ हजार वोटों से जीत तय कर दी थी। एनडीए उम्मीदवार के विरोधी लोजपा प्रत्याशी विजेंद्र चौधरी को मिलने वाले वोट शाह आलम की तरफ चले गए।
इस उपचुनाव में भी यह कहानी दोहराने की जमीन तैयार हो रही है। जिस तरह से वोटों की मोर्चाबंदी हो रही है, उससे कड़े मुकाबले की संभावना है। एक ओर वीआइपी ने नीलाभ कुमार को उतार कर भाजपा के वोटबैंक में सेंधमारी की तैयारी की है।
दूसरी ओर एआइएमआइएम उम्मीदवार मो. गुलाम मुर्तुजा का निशाना जदयू उम्मीदवार का वोटबैंक है। ये दोनों उम्मीदवार जितने अधिक वोट पाएंगे भाजपा और जदयू प्रत्याशियों की परेशानी उतनी ही बढ़ेगी।
वोटरों की संख्या की बात करें तो यहां वैश्य, मुस्लिम और यादव की संख्या करीब-करीब एक जैसी है। यह 35 से 37 हजार तक है। इसके अलावा भूमिहार और सहनी वोटर 30-30 हजार हैं।
कुर्मी और कुशवाहा को मिला दें तो उसके मतदाता की संख्या भी इतनी ही हो जाएगी। सबसे अधिक वोटर अनुसूचित जाति के हैं। इसकी संख्या करीब 50 हजार है। चुनाव की सारी रणनीति इन्हीं वोटरों पर बनाई जा रही है।
जदयू कुशवाहा के साथ राजद के माय समीकरण पर भरोसा कर रहा। इसमें दो तरफा सेंधमारी की रणनीति बनाई जा रही। कुशवाहा वोट में सेंधमारी के लिए भाजपा ने विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष सम्राट चौधरी को चुनाव की कमान सौंपी है।
वहीं एआइएमआइएम का निशाना ही अल्पसंख्यक वोटर हैं। ऐसे में राजद नेताओं से जदयू को उम्मीद होगी कि वे अधिक से अधिक यादव वोट उनकी ओर दिलाएं।

