मुजफ्फरपुर : बीजेपी ने कुढ़नी में तमाम जातीय गणित का गुणा-भाग करके वैश्य समाज से आने वाले केदार गुप्ता को अपना उम्मीदवार बनाया है. पार्टी जीत के दावे के कर रही है और साथ-साथ तमाम जातीय समीकरण भी साधने की कोशिश भी कर रही है. सियासी जानकार बताते हैं कि फिलहाल बीजेपी की पूरी नजर भूमिहार जाति के वोटरों पर टिक गई है.
दरअसल, भूमिहार वोट बैंक बीजेपी के कोर वोटर माने जाते हैं. लेकिन, इस समाज ने पिछले कुछ समय से बीजेपी को झटका देना शुरू कर दिया है. इसकी बड़ी तस्वीर बोचहां उपचुनाव में दिखी थी जब बड़ी संख्या में भूमिहार वोटरों ने बीजेपी से मुंह मोड़ लिया था. इस बार कुढ़नी में ऐसा न हो इसे लेकर बीजेपी ने पूरी ताकत झोंक दी है.
बीजेपी की परेशानी भूमिहार वोटरों को लेकर पहले ही बढ़ी हुई थी, लेकिन मुकेश सहनी के उम्मीदवार ने बीजेपी की परेशानी बढ़ा दी है. बता दें कि मुकेश सहनी ने कुढ़नी से चार बार विधायक रहे साधु शरण शाही के पोते नीलाभ कुमार को चुनावी मैदान में उतारा है. इनकी भूमिहार वोटरों पर अच्छी पकड़ मानी जाती है. वहीं जदयू भी भूमिहार वोटर को अपने पाले में करने के लिए राष्ट्रीय अध्यक्ष ललन सिंह खुद कुढ़नी में कैंप कर रहे हैं. जदयू के अन्य कई भूमिहार नेता भी लगातार कुढ़नी में भूमिहार बहुल गांवों में लगातार प्रचार कर रहे हैं.
ऐसा नहीं है की बीजेपी की नजर इन बातों पर नहीं है. अपने कोर भूमिहार वोटरों को अपने ही पाले में रखने के लिए बीजेपी के कई भूमिहार नेता और कार्यकर्ता ने पूरा जोर लगा रखा है. यही नहीं बोचहां में जिस बीजेपी नेता और पूर्व मंत्री सुरेश शर्मा की नाराजगी की वजह से हार मिली थी, उन्हें काफी समझाने के बाद बीजेपी ने कुढ़नी में बड़ी जिम्मेदारी दे दी है और वे लगातार भूमिहार वोटरों को गोलबंद करने में लग गए हैं.

बहरहाल, कुढ़नी विधान सभा उप चुनाव दोनों गठबंधन के लिए लिटमस टेस्ट माना जा रहा है. खासकर जो उनके कोर वोटर रहे हैं, वो उनके साथ कितनी मजबूती से उनके साथ खड़े हैं, यह देखना बेहद दिलचस्प होगा. जिस गठबंधन के कोर वोटरों ने झटका दिया उन्हें न केवल इस उपचुनाव में झटका लगना तय है, बल्कि आने वाले 2024 लोकसभा चुनाव और 2025 के विधान सभा चुनाव में भी नई रणनीति के तहत समीकरण बनाने होंगे.




