बिहार में महागठबंधन के लिए MO फैक्टर बना जी का जंजाल, कुढ़नी चुनाव में भी दिखा इसका असर

पटना. बिहार में कुढ़नी उपचुनाव ने राजनीति में एक नये फैक्टर को जन्म दिया है. यह फैक्टर है एमओ (MO) फैक्टर. राजनीतिक जानकारों की माने तो बिहार की सियासत में यह फैक्टर महागठबंधन के लिए खास तौर पर सिरदर्द साबित हो रहा है. कुढ़नी में महागठबंधन की पराजय के पीछे एक वजह से  MO फैक्टर भी माना जा रहा है. दरअसल बिहार में कुढ़नी में हुए उपचुनाव के कांटे की टक्कर में जदयू के मनोज कुशवाहा भाजपा के प्रत्याशी केदार प्रसाद गुप्ता से 3632 मतों से पराजित हो गए. भाजपा प्रत्याशी को कुल 76653 वोट मिले जबकि जदयू प्रत्याशी को 73008 वोट ही मिल सके. भाजपा और जदयू में जीत का अंतर 3645 मतों का रहा.

राजनीतिक जानकारों की माने तो बिहार की सियासत में यह फैक्टर महागठबंधन के लिए खास तौर पर सिरदर्द साबित हो रहा है.

जदयू और खासकर नीतीश कुमार की यह एक बड़ी हार के रूप में देखा जा रहा है. महागठबंधन सरकार जब से सत्ता में आई है तब से तीनों उपचुनाव में दो भाजपा और एक राजद ने जीता है. इन सभी नतीजों पर एक बात साफ तौर पर देखी जा रही है कि बिहार की सियासत में MO यानी मुकेश- ओवैसी फैक्टर महागठबंधन के लिए परेशानी का सबब बना हुआ है. सच तो यह है कि महागठबंधन को MO फैक्टर का तोड़ तलाशना होगा. कुढ़नी में महागठबंधन की हार के पीछे भी एक बड़ी वजह एमओ फैक्टर माना जा रहा है. हमने सीधे तौर पर मुकेश साहनी सही यह सवाल किया तो उनका जवाब इस रूप में सामने आया.

सियासत के जानकारों की माने तो एमओ। फैक्टर महागठबंधन के लिए जी का जंजाल बन गई है. खासकर मुस्लिम और निषाद के वोटों को जिस तरीके से ओवैसी की पार्टी और मुकेश साहनी  गोलबंद करने में सफल रहे हैं वैसे में वह भले ही चुनाव नहीं जीत सके लेकिन महागठबंधन की राह में मुश्किलें जरूर खड़ा कर दिए. सच तो यह है कि इनके द्वारा लाए गए वोट से महागठबंधन को चुनाव जीतने की मंशा पूरी नहीं हो सकी. यही मुकेश साहनी और ओवैसी की पार्टी की ताकत और जीत भी है कुढ़नी उपचुनाव में ओवैसी की पार्टी ने उतने ही वोट प्राप्त किए  जितने वोटों के अंतर से महागठबंधन को पराजय का सामना करना पड़ा.

महागठबंधन से भाजपा को 3645  वोट अधिक मिले वहीं ओवैसी की पार्टी को 3202 वोट मिले ऐसा है कोई गोपालगंज में भी देखने को मिला था. कुल मिलाकर मुकेश -ओवैसी की पार्टी महागठबंधन की हार के लिए जिम्मेवार है. दबी जुबान से बड़े राजनीतिक दलों के नेता इस बात को स्वीकार भी करते हैं. हालांकि मुकेश सहनी द्वारा प्रत्याशी खड़ा किए जाने पर सवाल उठाने वाली भाजपा इस मामले को सिरे से खारिज करती नजर आ रही है.

राजनीतिक  जानकारों की मानें तो ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम की तरह वीआईपी पार्टी भी अपने वोटरों को लामबंद करने में सफल होती जा रही है. बिहार में अपनी ताकत का एहसास महागठबंधन को कराने में मुकेश सहनी सफल होते दिख रहे हैं. अगर मुकेश साहनी की ताकत को महागठबंधन द्वारा हल्के में नहीं लिया गया होता तो शायद आज निषादों के ज्यादातर वोट महागठबंधन की झोली में जरूर गिरे होते. वीआईपी पार्टी को कुढ़नी उपचुनाव में लगभग 10000 वोट मिले हैं उसमें से वोट का एक हिस्सा महागठबंधन के पाले में जरूर जा सकता था. मुकेश सहनी ओवैसी की पार्टी के उम्मीदवारों की ओर से कांटे के वोटों को जोड़ा जाए तो महागठबंधन के प्रत्याशी की जीत सुनिश्चित हो गई होती.
बहरहाल , बिहार की मौजूदा चुनावी राजनीति में MO फैक्टर का उभरना फौरी तौर पर ही सही बड़ी राजनीतिक पार्टियों के लिए चिंता का सबब बन गया है. कई पार्टियां इस फैक्टर को क्षणिक बता रही है, लेकिन छोटी पार्टियों ने उनके लिए चिंता की लकीरें तो खींच ही दी है.

 

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