मधुबनी: मधुबनी के बेनीपट्टी अनुमंडल मुख्यालय से उत्तर-पश्चिम दिशा में पांच किलोमीटर की दूरी पर स्थित सिद्धपीठ उच्चैठ भगवती स्थान एक मूर्ख व्यक्ति के महाकवि कालिदास बनने के ऐतिहासिक प्रमाण समेटे हुए है। आज भी कालिदास के गुरुकुल का अवशेष डीह यहां मौजूद है। 150 वर्ष ईसा पूर्व से 450 ईसवी के मध्यकाल में महामूर्ख कलुआ के महाकवि बनने की शुरुआत उच्चैठ भगवती स्थान से हुई थी। उसके बाद उन्होंने रघुवंशम्, मेघदूतम् जैसी कालजयी रचनाएं की।
उच्चैठ भगवती स्थान पर विभिन्न रूपों में कलुआ के कालिदास बनने की कथा को दर्शाया गया है। यहां वह नदी आज भी मौजूद है जिसे पारकर कलुआ ने भगवती का आशीष पाया था। शक्ति उपासकों के लिए उत्तर बिहार के सबसे महत्वपूर्ण स्थलों में से एक इस स्थान पर नवरात्र में भारी भीड़ उमड़ती है।
दरअसल, मालवा राज्य की अत्यंत बुद्धिमान और रूपवती राजकुमारी विद्योतमा से शास्त्रार्थ में मिली हार ने कुछ प्रकांड पडितों में ऐसी हीन भावना भर दी कि उन्होंने उनका विवाह छल से मूर्ख कलुआ के साथ करवा दिया। विद्योत्मा को सच्चाई पता चली तो वे कलुआ को हर बात पर ताने देने लगीं। पत्नी से बेहद प्रेम करने वाले कलुआ को जब इस अनुराग को लेकर भी विद्योत्मा से धिक्कार मिली तो उनका पुरुषार्थ जाग गया। वह घर से निकल गए और उच्चैठ पहुंचकर थुमानी नदी किनारे एक गुरुकुल में शरण ली। गुरुकुल में वे रसोइए का काम कर जीवन व्यतीत करने लगे।
गुरुकुल और भगवती स्थान के बीच थुमानी नदी थी। गुरुकुल की ओर से प्रतिदिन गोधुली बेला में भगवती के समक्ष दीप जलाया जाता था। सावन माह में थुमानी नदी भयानक उफान पर थी। उफनाती नदी को पारकर भगवती के समक्ष दीप जलाने की किसी की हिम्मत नहीं हो रही थी। गुरु ने आदेश दिया कि आज कलुआ ही भगवती के समक्ष दीप जलाएगा। गुरु की आज्ञा का पालन करते हुए वे हर हर महादेव का जयघोष करते नदी तैरकर भगवती के समक्ष दीप प्रज्जवलित कर वापस लौटने लगे।
भगवती के समक्ष दीप जलाने का प्रमाण रखने के लिए वे दीप की कालिख हाथ में लेकर भगवती के चेहरे पर मलने लगे। कलुआ की इस निश्छल भक्ति ने माता को प्रसन्न कर दिया। माता ने प्रकट होकर कलुआ से वरदान मांगने को कहा। मूर्खता के लिए पत्नी के तानों से आहत कलुआ ने माता से सबसे बड़ा विद्वान होने का वर मांगा। माता ने कलुआ की जिह्वा पर सरस्वती के वास का वरदान देकर उन्हें कलुआ से महाकवि कालिदास बना दिया। कालिदास द्वारा रचित काव्य ग्रंथ रघुवंशम्, कुमारसंभव, मेघदूत और ऋतुसंहार एवं नाटक अभिज्ञान शाकुंतलम, मालविकाग्निमित्र और विक्रमोर्वशीय कालजयी हैं। उन्होंने 40 उत्कृष्ट रचनाएं दीं।
