यहां रावण ने की थी दसशीशानाथ की स्थापना, सहस्रबाहु से किया था युद्ध; जागृत शिव के करें दर्शन

रोहतास : रोहतास जिले के दसशीशानाथ को लेकर कई कहानियां प्रचलित हैं। कहा जाता है कि रावण ने यहां महादेव की स्थापना कर पूजा-अर्चना की थी, जिस कारण इसका नाम दसशीशानाथ पड़ा। कहा जाता है कि यहां शिवलिंग के दर्शन मात्र से ही मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं।

कैलाश पर्वत से रावण ने लाया था शिवलिंग 

स्थानीय लोगों का कहना है कि रावण जब कैलाश पर्वत से भगवान शिव को लंका में स्थापित करने के लिए ले जा रहा था। तब उसे लघुशंका लगी। रावण ने शिवलिंग को उसी स्थान पर रख दिया। बाद में जब रावण ने शिवलिंग को उठाना चाहा तो वह नहीं हिला। रावण ने शिवलिंग को उसी स्थान पर रहने दिया। वहां सोन नदी के जल से जलाभिषेक कर पूजा अर्चना शुरू कर दी। तब से शिवलिंग उसी स्थान पर स्थापित है।

जागृत अवस्था में हैं भगवान शिव  

जिले के नौहट्टा प्रखंड के बांदू गांव के पास बिहार-झारखंड की सीमा पर सोन, कोयल व सरस्वती नदी के संगम पर मध्य धारा में दसशीशानाथ अवस्थित है। कहा जाता है कि भगवान शिव यहां जागृत अवस्था में हैं। दसशीशानाथ का वर्णन कई शास्त्रों में मिलता है। महाशिवरत्रि के दौरान यहां दूर-दूर से श्रद्धालु जलाभिषेक के साथ पूजा-अर्चना के लिए आते हैं।

हजारों वर्षों से अपने स्थान पर याथावत है शिवलिंग 

सोन नदी में चबूतरे पर जिस स्थान पर दसशीशानाथ अवस्थित है। उस जगह पर कोयल व सरस्वती नदी सोन नदी में मिलती है। इस कारण उसे संगम भी कहते हैं। आस्था के साथ विश्वास है कि दसशीशानाथ की स्थापना त्रेता युग में हुआ था। ये शिवलिंग आठ माह तक सोन नदी के जल में विसर्जित रहता है। चार माह ही महादेव के दर्शन होते हैं। शिवलिंग स्थापना के हजारों वर्ष बाद भी यह अपने स्थान पर यथावत है। हजारों वर्षां के दौरान सोन नदी में कई बार विनाशकारी बाढ़ आ चुकी है। गांव के गांव तबाह हो गए। विशालकाय से विशालकाय पेड़ सोन नदी की तेज धाराओं में धाराशायी हो गये, लेकिन महादेव का शिवलिंग अपने स्थान से नहीं हिला।। इस कारण इसे रहस्मयी शिवलिंग भी कहते हैं। यही वजह है कि सोन की तेज धारा के बीच श्रद्धालु नाव के माध्यम से महादेव के दर्शन करने पहुंचते हैं।

सहस्रबाहु व रावण की युद्ध की भी कहानी हैं प्रचलित 

दसशीशानाथ के पास महिष्मति के राजा सहस्रबाहु व रावण के बीच हुए युद्ध की भी कहानी प्रचलित हैं। ग्रामीण बताते हैं कि सहस्त्रबाहु अपने सैंकड़ों रानियों के साथ सोन नदी में स्नान करने पहुंचा था। उसकी एक रानी के कहने पर उसने अपनी भुजाओं से सोन नदी के पानी को रोक दिया। उसी समय रावण भी शिवलिंग पर जलाभिषेक करने पहुंचा था। जलाभिषेक के लिए रावण को पानी नहीं मिलने पर वह क्रोधित हो उठा, जिसके बाद सहस्त्रबाहु और रावण के बीच युद्ध हुआ था। सहस्त्रबाहु के एक ही वार में रावण चित हो गया था। रावण की पराजय के बाद उसे बंदी बना लिया गया था।

मनोकामनाएं होती हैं पूरी 

मान्यता है कि इस स्थान पर आकर शिवलिंग के दर्शनमात्र से ही मनोकामनाएं पूर्ण होती है। यही वजह है कि दुर्गम रास्तों से होते हुए सोन नदी के धारा को लांघ कर श्रद्धालु दसशीशानाथ के दर्शन को पहुंचते हैं।

शिलालेख देख प्रचीनता का लगाया जा सकता है अंदाजा

दसशीशानाथ महादेव के पास पहाड़ी पर 16 शिलालेख मौजूद हैं। शिलालेख को देख इसकी प्राचीनता का अंदाजा लगाया जा सकता है। प्राचीन काल में राजाओं ने महादेव के दर्शन के दौरान यहां शिलालेख लगवाया था। खरवार राजा प्रताप धवल देव की पूरी वंशावली यहां अंकित है।

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