मुजफ्फरपुर की बांसुरी की हर जगह धूम, 30 परिवार करते है ये काम….

मुजफ्फरपुर : जिले का सुमेरा पंचायत बांसुरी बनाने वाले लोगों के गांव के रूप में जाना जाता है.सुमेरा पंचायत के ही बड़ा सुमेरा स्थित मुर्गिचक गांव में तकरीबन 30 परिवार बांसुरी बनाने के कारोबार से जुड़े हुए हैं. यहां के लोग एक-दो नहीं, बल्कि पुश्त दर पुश्त इस काम से जुड़े हुए हैं.बड़ा सुमेरा के ही सबसे पुराने बांसुरी मिस्त्री मो.आलम बताते हैं कि 40 साल पहले उन्होंने अपने पिता से बांसुरी बनाने का हुनर सीखा था. जबकि उनके पिता को बाहर से आए कारीगर ने बांसुरी बनाना सिखाया था.

Pilibhit: स्कूल-कॉलेज में छात्रों को सिखाई जाएगी 'बांसुरी', जानें  वैरायटी-कीमत से लेकर वर्ल्‍ड रिकॉर्ड तक - flute will be taught to students  in school college one district one ...मो. आलम कहते हैं कि पहले के दिनों में बांसुरी का अच्छा मार्केट था. इसलिए उन्होंने अपने पिता से बांसुरी बनाने की कला सीखी. उसके बाद आलम बांसुरी बनाने के काम में लग गए. शुरुआती दौर में जब वह काम करते थे, तो दूर-दूर तक जाकर बांसुरी बेचते थे. वे बताते हैं कि पहले के दौर में बांसुरी की अच्छी डिमांड थी. मेला और बाजार में बच्चे से लेकर बड़े-बुजुर्ग तक बांसुरी खरीदते थे, लेकिन अब बड़े-बड़े प्लास्टिक के खिलौने के सामने बांसुरी की डिमांड कम गई है. फिर भी उन्होंने और उनके जैसे तकरीबन 30 परिवार ने बांसुरी बनाने का काम जारी रखा है. यह उनका खानदानी पेशा है, इसलिए बांसुरी बना रहे हैं.
नरकट से तैयार किया जाता है बांसुरी

मो. आलम बताते हैं कि बांस की तरह ही जंगल में नरकट मिलता है. बांसुरी को नरकट से ही तैयार किया जाता है. नरकट की बारीक छीलाई कर इसे काटा जाता है. इसके बाद इसे बांसुरी का शक्ल दिया जाता है. उन्होंने बताया किवह रोजाना 200 पीस बांसुरी बना लेते हैं. मो. आलम बताते हैं कि खेलने वाले बांसुरी की कीमत 10 रुपए से शुरू है. बाकी अच्छी क्वालिटी की बांसुरी 200 से 300 रुपए तक में बिक जाती है. मेला के वक्त बांसुरी की अधिक डिमांड होती है. बांसुरी बनाने के बाद में घूम घूम कर बेचने का काम भी करते हैं. मो. आलम बताते हैं कि मुनाफा नहीं होने की वजह से उनके बेट ने यह काम छोड़ दिया. बांसुरी बनाने के काम में यह उनकी आखिरी पीढ़ी है.

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