बिहार के दरभंगा जिले में स्थित नरगौना टर्मिनल तिरहुत के गौरवशाली विकास का गवाह है। बात 17 अप्रैल, 1874 की है। वाजितपुर से चलकर पहली ट्रेन दरभंगा पहुंची थी। करीब 150 साल पहले वाजितपुर टर्मिनल से नरगौना टर्मिनल तक 55 मील लंबे इस रेलखंड का निर्माण सिर्फ 62 दिनों में पूरा किया गया था। यह एक विश्व रिकॉर्ड था। महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह ने तिरहुत रेलवे कंपनी स्थापित की और उसका मुख्यालय दरभंगा के मोती महल को बनाया। रेलखंड बनाने की जिम्मेदारी इंग्लैंड की एक कंपनी को सौंपी गयी। दूरसंचार के लिए तार बिछाने का ठेका रमेश्वर सिंह अर्थात लंगट सिंह को मिला।
जानकारों का मानना है कि इस रेलखंड ने मिथिला का विकास किया और इससे इस क्षेत्र के लोगों को गिरमिटिया बनने को मजबूर नहीं होना पड़ा। कहा जाता है कि 19वीं सदी के आखिरी दो दशक में भारत में सबसे अधिक रेल पटरियां कहीं बिछाई गईं तो वह तिरहुत का इलाका था। जब बंगाल में अकाल का वक्त था, तिरहुत में अनाज के कई गोदाम भरे थे। बंगाल में अकाल की तमाम तस्वीरों में तिरहुत की कोई तस्वीर नहीं है।
निश्चित रूप से तिरहुत स्टेट रेलवे ने बंगाल तक अनाज पहुंचाने का काम किया था। तिरहुत के एक शहर से दूसरे शहर तक अनाज की आवाजाही तेजी से हुई थी। दरभंगा राज परिवार पर शोध करने वाले आशीष कुमार बताते हैं, शुरुआती दिनों में पटरियों पर केवल मालगाड़ी चली, लेकिन फिर आम लोगों के लिए यात्री ट्रेन भी उपलब्ध हुई। भारत में रेलवे के आने के महज 20 साल बाद तिरहुत की जमीन पर लोगों के लिए रेल सुविधा उपलब्ध हो चुकी थी।
टर्मिनल पर आया था वायसराय का सैलून
आशीष के अनुसार 1883 में भारत के वायसराय ने पहली बार अपने आधिकारिक रेल सैलून से कोलकाता से दरभंगा तक की यात्रा की थी। उनका सैलून दरभंगा के नरगौना टर्मिनल तक आया था। नरगौना टर्मिनल को भारतीय रेलेव के इतिहास के सबसे सुनहरे पन्नों में से एक माना जाता है। नरगौन टर्मिनल पर तिरहुत सरकार का रेल सैलून 80 के दशक तक लगा रहता था।
पहली बार तीसरे दर्जे में शौचालय
रेलवे ने तीसरे दर्जे के डिब्बों में पहली बार शौचालय की सुविधा 1917 में महाराजा रमेश्वर सिंह के आग्रह पर अपनी ट्रेनों में प्रदान की थी। भारत में यह पहला रेलखंड था जहां तीसरे दर्जे के डिब्बे में शौचालय की सुविधा उपलब्ध थी। बाद में इसी रेलखंड पर तीसरे दर्जे के डिब्बे में पंखे की सुविधा भी दी गयी।