बागमती नदी सीतामढ़ी में मचा रही भारी तबाही, कटाव के चलते लोग घरबार छोड़कर पलायन को मजबूर

सीतामढ़ी : उत्तरी बिहार को कोसी और बागमती नदी की वजह से प्रत्येक वर्ष भारी नुकसान का सामना करना पड़ता है. परंतु इस साल बागमती नदी अपने उफान पर है, उफान इतना ज्यादा है कि सीतामढ़ी जिले के मेजरगंज प्रखंड अंतर्गत रसूलपुर गांव के लोग नदी के कटाव से बचने के लिए अपना घर बार छोड़कर पलायन करने पर मजबूर हो रहे हैं. लोग स्वयं से अपना घर तोड़कर रिश्तेदारों या फिर दूसरे जगह आशियाना बनाकर रहने पर मजबूर हो हैं. स्थानीय जगदीश नारायण सिंह ने बताया कि लगातार हो रही बारिश और नेपाल से पानी छोड़े जाने की वजह से नदी में कटाव तेज हो गया है. जो नदी यहां से कभी 3 से 4 किलोमीटर दूर से वह रही थी, वह वर्तमान समय में पूरे गांव को अपने आगोश में लेने के लिए आतुर है. महज तीन से चार दिनों में ही लगभग 1 किलोमीटर तक का भू-भाग नदी में समा चुका है. उन्होंने बताया कि खेती कर अपना जीवन यापन करते हैं, परंतु कई बीघा जमीन कटाव के कारण नदी में विलीन हो गया.

आशियाना तोड़कर पलायन करने को विवश हो रहे हैं लोग

राकेश सिंह ने बताया कि पिछले तीन-चार वर्षो से बागमती नदी के उफान पर रहने के चलते कटाव जारी है. लेकिन स्थानीय प्रशासन से लेकर सरकार का इस ओर कोई ध्यान नहीं है. स्थिति ऐसी आन पड़ी है कि लोगों की समस्या भी सुनने को तैयार नहीं है. उन्होंने बताया कि पूर्वज नदी के रौद्र रूप से बचने के लिए रसूलपुर गांव में आकर बस गए थे. लेकिन ऐसी स्थिति आन पड़ी है कि अब यहां से भी घर छोड़कर पलायन करने को विवश होना पड़ा है. उन्होंने बताया कि न जाने कौन सी भूल हुई है कि नदी गांव वालों से यह बदला ले रही है. संजीव सिंह ने अपने दर्द को बयां करते हुए कहा कि 10 वर्ष पूर्व हीं घर बनाए थे, जिसको अब तोड़ना पड़ा है. इस डर की वजह से की रातों-रात कहीं नदी अपने उफान पर आकर जमीन का कटाव न करने लगे और जो कुछ भी बचा है वह भी पानी के साथ बहकर न चला जाए. लकड़ी के घर तो दूर की बात है लोग पक्के मकान भी तोड़ रहे हैं. ताकि उस ईट-पत्थर का उपयोग किसी दूसरे जगह घर बनाने के लिए किया जा सके.


नदी में लगातार समा रहा है फसल लगा उपजाउ जमीन

रसूलपुर गांव के ज्यादातर परिवार अपने जीवन यापन के लिए कृषि पर हीं आश्रित है. लेकिन इस विकट परिस्थिति में जब नदी अपने उफान पर है तो न जाने कितने एकड़ उपजाऊ जमीन को अपने आगोश में लेगी. किसान प्राकृतिक आपदा से डरे सहमे और नाराज भी हैं. परंतु उन लोगों का सुनने वाला कोई नहीं है. लोगों का कहना है कि तकनीक का इस्तेमाल कर हीं कटाव को रोका जा सकता है. बड़े-बड़े पत्थरों को लोहे की जाल में नदी के किनारे डाला जा सकता है. कई बार ग्रामीणों के द्वारा मांग की गई, लेकिन अमल नहीं होने के कारण अब लोगों को अपना घर तोड़कर विस्थापित हो रहे है.

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