नालंदा लोकसभा क्षेत्र में वैसे तो सातवें चरण में चुनाव है, लेकिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का गृह जिला होने के चलते यहां चुनावी रण अभी से खास बना हुआ है। एक जमाने में कांग्रेस और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) का गढ़ रहे इस क्षेत्र की विशेषता यह है कि 1996 से लगातार हुए आम चुनाव और एक उपचुनाव में नालंदा की जनता ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से आगे नहीं सोचा है।
नीतीश कुमार के इस गढ़ में उन्हीं की पार्टी के उम्मीदवार आठ आम चुनाव से जीतते रहे हैं। ऐसे में यहां पर महागठबंधन के भाकपा माले उम्मीदवार संदीप सौरव के लिए बड़ी अग्निपरीक्षा है। इस परीक्षा में वे कितने अंक ला पाएंगे, यह तो चुनाव परिणाम बताएगा, किंतु एनडीए के जदयू प्रत्याशी कौशलेन्द्र कुमार की जीत में सबसे बड़ा सहारा नीतीश कुमार का नाम ही है। वर्ष 2004 में नीतीश कुमार भी नालंदा से चुने गए थे।
इस तरह रहा है कांग्रेस व भाकपा का कब्जा
एक जमाने में नालंदा लोकसभा क्षेत्र पर कांग्रेस व भाकपा का कब्जा रहा, लेकिन 1996 के आम चुनाव से यहां से नीतीश कुमार की पार्टी ने जीत दर्ज की और पिछले 28 वर्षों से नीतीश कुमार की पार्टी के ही उम्मीदवार जीते। 1952 के पहले आम चुनाव में पटना सेंट्रल लोकसभा क्षेत्र का नालंदा हिस्सा था। तब कांग्रेस के उम्मीदवार कैलाशपति सिन्हा यहां से जीते थे। इसके बाद 1957 में नालंदा लोकसभा क्षेत्र बना। तब भी कांग्रेस के कैलाशपति सिन्हा ही जीते। फिर 1962, 1967 और 1971 के आम चुनाव में कांग्रेस के सिद्धेश्वर प्रसाद यहां से जीतते रहे। कांग्रेस की जीत के इस सिलसिले को वर्ष 1977 के आम चुनाव में जनता पार्टी के उम्मीदवार वीरेंद्र प्रसाद ने रोका।




