अनंत पूजा, मिथिला क्षेत्र की एक प्राचीन और महत्वपूर्ण धार्मिक परंपरा है, जिसमें विशेष रूप से शालिग्राम की पूजा और विष्णु की जाती है. इस पूजा के दिन, घरों में विशेष पकवान बनाए जाते हैं और बांस की डाली में पकवान, मिठाइयां और फल सजाए जाते हैं. पूजा के बाद, श्रद्धालु अपने हाथ पर रक्षा सूत्र बांधते हैं, जिसे अनंत के रूप में पूजा जाता है.

प्रत्येक गांठ का धार्मिक महत्व
अनंत पूजा की अनूठी विशेषता यह है कि श्रद्धालु अनंत धागे को कम से कम 14 दिनों तक अपने बाह पर बांधकर रखते हैं, जबकि कुछ लोग इसे पूरे एक साल तक नहीं हटाते. पिछली बार बांधे गए अनंत धागे को पूजा के बाद मिट्टी में डालकर पुराना धागा बदल दिया जाता है. इस पूजा में 14 गांठों वाला धागा उपयोग में लाया जाता है, जिसमें प्रत्येक गांठ का एक विशेष धार्मिक महत्व होता है. यह परंपरा महाभारत काल से चली आ रही है. जब युधिष्ठिर ने पहली बार भगवान विष्णु की पूजा कर हाथ पर रक्षा सूत्र बांधने की शुरुआत की थी, तब से लेकर आज तक यह पूजा मिथिला में एक महत्वपूर्ण धार्मिक अनुष्ठान बन गई है. अनंत पूजा के दिन, पुरुष दाएं हाथ पर और महिलाएं बाएं हाथ पर धागा बांधती हैं.

धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहर
यह धागा न केवल श्रद्धा और भक्ति का प्रतीक है, बल्कि यह एक प्रकार की सुरक्षा और आशीर्वाद की प्रतीकता भी दर्शाता है. पूजा के दौरान श्रद्धालु अपने परिवार और समाज की भलाई के लिए प्रार्थना करते हैं और इस दिन को एक दिव्य उत्सव के रूप में मनाते हैं. अनंत पूजा मिथिला की धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहर का महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो न केवल भक्ति की भावना को उजागर करता है, बल्कि पारंपरिक रीति-रिवाजों और अनुष्ठानों को भी जीवित रखता है.