प्रकाश सिन्हा (संपादक) की कलम से।
आज समाज एक विचित्र दौर से गुज़र रहा है। जिन लोगों को कभी समाज के पथ-प्रदर्शक और सेवा के सच्चे वाहक माना जाता था—वे अब राजनीति के गलियारों में दस्तक दे रहे हैं। आश्चर्य इस बात का नहीं है कि वे राजनीति में आ रहे हैं, बल्कि इस बात का है कि सेवा का असली उद्देश्य पीछे छूट गया है, और उसकी जगह ले ली है सत्ता, प्रभाव और संपत्ति की लालसा ने।

मुज़फ़्फ़रपुर जैसे ज़िलों में हाल के वर्षों में देखा गया है कि कुछ धनाढ्य वर्ग के लोग, जिन्होंने व्यवसाय, चिकित्सा, शिक्षा या अन्य क्षेत्रों में अच्छा-खासा नाम और पैसा कमाया है, अब राजनीति में कूदने लगे हैं। सार्वजनिक मंचों पर ये लोग ‘सेवा’ की दुहाई देते हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि इनका उद्देश्य जनसेवा कम और स्वयं की प्रतिष्ठा, प्रभाव और पूंजी का विस्तार अधिक है।

राजनीति अब सेवा का माध्यम नहीं, बल्कि काली कमाई को वैध करने और सैकड़ों गुना बढ़ाने का मंच बन चुकी है। विधायक-सांसद बनने की चाहत में लोग अपनी मूल जिम्मेदारियों से विमुख हो रहे हैं। कोई व्यवसाय छोड़ रहा है, कोई अस्पताल, कोई कोचिंग सेंटर—बस इसलिए कि “सेवा” का नया नाम अब “नेता” बन गया है।
सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि देश के शीर्ष शैक्षणिक संस्थानों से निकले बुद्धिजीवी भी इस दौड़ में शामिल हो रहे हैं। जिन्होंने वर्षों मेहनत कर खुद को साबित किया, अब वही लोग बिना विचार किए राजनीति की भीड़ में शामिल हो रहे हैं—कभी टिकट के पीछे भागते हुए, तो कभी मंच से भाषण देते हुए।

क्या समाज की सेवा केवल विधानमंडल या संसद के गलियारों से ही की जा सकती है? क्या एक डॉक्टर अपने क्लिनिक में, एक शिक्षक अपने विद्यालय में, और एक व्यापारी अपने संसाधनों के माध्यम से समाज का उत्थान नहीं कर सकता?
समाज को अब जागरूक होना होगा। राजनीति में वही लोग आएं, जिनके भीतर सच्ची जनसेवा की भावना हो—न कि वे, जो अपने धन को सफेद करने और प्रभाव बढ़ाने के इरादे से जनभावनाओं का सौदा कर रहे हैं।
यह समय है आत्ममंथन का—सेवा के नाम पर सत्ता की भूख से लड़ने का। क्योंकि अगर राजनीति सिर्फ धंधा बन गई, तो लोकतंत्र एक बाज़ार बन जाएगा।




