शहीद सूरज नारायण सिंह: किसानों-मजदूरों के मसीहा और स्वतंत्रता संग्राम के निर्भीक योद्धा — पूर्व सांसद आनंद मोहन ने दी श्रद्धांजलि

गायघाट, मुजफ्फरपुर से दीपक कुमार की रिपोर्ट:

शुक्रवार को गायघाट प्रखंड के बुधकारा में आयोजित एक विशेष कार्यक्रम में पूर्व सांसद आनंद मोहन ने शहीद सूरज नारायण सिंह को याद करते हुए कहा कि वे केवल एक स्वतंत्रता सेनानी ही नहीं, बल्कि किसानों और मजदूरों के अधिकारों के लिए आजीवन समर्पित एक महान समाजवादी योद्धा थे। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में ग्रामीण, बुद्धिजीवी और राजनीतिक कार्यकर्ता मौजूद थे।

आनंद मोहन ने कहा कि मधुबनी जिले के नरपति नगर गांव में 17 मई 1907 को जन्मे सूरज बाबू का जीवन संघर्ष, बलिदान और समाजसेवा की मिसाल है। एक संभ्रांत जमींदार परिवार में जन्म लेने के बावजूद उन्होंने गरीबों, किसानों और मजदूरों की पीड़ा को अपना उद्देश्य बना लिया।

हजारीबाग जेल से जेपी को कंधे पर लेकर निकले थे सूरज बाबू

कार्यक्रम में शिवहर की सांसद लवली आनंद ने कहा कि सूरज बाबू का योगदान केवल आज़ादी के आंदोलन तक सीमित नहीं था। उन्होंने स्वतंत्रता के बाद भी समाज के अंतिम व्यक्ति के अधिकारों की लड़ाई लड़ी। उन्होंने हजारीबाग जेल से पंडित रामनंदन मिश्र और लोकनायक जयप्रकाश नारायण को कंधे पर उठाकर जेल तोड़ने का साहसिक कार्य किया। इस योजना में योगेंद्र शुक्ला, गुलाबी सुनार और शालिग्राम सिंह जैसे क्रांतिकारियों का सहयोग रहा।

श्रमिक आंदोलन के दौरान हत्या, जेपी बोले- ‘मेरा दाहिना हाथ टूट गया’

लवली आनंद ने कहा कि 21 अप्रैल 1973 को रांची स्थित उषा मार्टिन रोप कारखाने के मुख्य द्वार पर जब वे अन्य मजदूरों के साथ अनशन पर बैठे थे, तब पूंजीपतियों और भ्रष्ट प्रशासन की मिलीभगत से उनकी हत्या कर दी गई।

इस हृदयविदारक घटना के बाद लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने उनकी लाश से लिपट कर रोते हुए कहा, “मेरा दाहिना हाथ टूट गया। अंग्रेज की सेना सूरज बाबू को नहीं मार सकी, लेकिन आज़ाद भारत की व्यवस्था ने उन्हें मार डाला।” इस घटना ने जेपी को इतना विचलित किया कि उन्होंने 1974 में सम्पूर्ण क्रांति आंदोलन की शुरुआत कर दी, जिसने आगे चलकर सत्ता परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त किया।

नई पीढ़ी को जोड़े रखने के लिए सूरज बाबू के नाम पर शोध संस्थान की मांग

कार्यक्रम में वक्ताओं ने बिहार सरकार और भारत सरकार से आग्रह किया कि शहीद सूरज नारायण सिंह के नाम पर एक सामाजिक शोध संस्थान की स्थापना की जाए, ताकि आने वाली पीढ़ी उनके जीवन, विचारों और संघर्ष से प्रेरणा ले सके। वक्ताओं ने कहा कि सूरज बाबू जैसे महान व्यक्तित्व का इतिहास केवल किताबों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि सामाजिक चेतना का आधार बनना चाहिए।

समाप्ति पर श्रद्धांजलि और संकल्प

कार्यक्रम का समापन सूरज बाबू की तस्वीर पर माल्यार्पण और दो मिनट के मौन श्रद्धांजलि के साथ हुआ। उपस्थित लोगों ने संकल्प लिया कि वे सूरज बाबू के दिखाए मार्ग पर चलकर समाज में न्याय, समानता और स्वाभिमान की भावना को जीवित रखेंगे।

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