छह महीने के बच्चे को 46 घंटे बाद पहुंचाया गया उसकी मां तक

अमृतसर रेल हादसे में 62 लोगों की मौत के 40 घंटे बाद पुलिस ने रविवार सुबह प्रदर्शनकारियों को खदेड़कर रेलवे ट्रैक खुलवा दिया। प्रदर्शनकारियों ने पुलिस पर पथराव किया। इसमें पुलिस का एक कमांडो और एक पत्रकार घायल हो गया। दूसरी, ओर अस्पतालों से अपनों के मिलने-बिछड़ने की खबरें आती रहीं। एेसा ही एक मामला तब सामने आया, जब छह महीने के बच्चे को 46 घंटे बाद उसकी मां तक पहुंचाया गया। बच्चा ट्रैक के पास पड़ा मिला था। दुखद ये कि इसके पिता की हादसे में मौत हो गई है।

दशहरे की शाम 62 लोगों के ट्रेन से कटकर मरने से गुस्साए लोग तीसरे दिन भी ट्रैक पर प्रदर्शन करते रहे। पुलिस ने पथराव के बीच प्रदर्शनकारियों को रेलवे ट्रैक से खदेड़ा। हादसे के 40 घंटे बाद अमृतसर से ट्रेन सर्विस शुरू हो सकी।

राधा समझ नहीं पा रही है कि बच्चे के मिलने की खुशी मनाए या पति के गुजरने का गम…

भागलपुर की आरती को नहीं पता, पति व बेटे को एक ही ताबूत में श्मशान भेजा

हादसे में घायल भागलपुर (बिहार) की 30 वर्षीय आरती का इलाज चल रहा है। लेकिन, उसका पति जितेंद्र और डेढ़ साल का बेटा शिवम अब जिंदा नहीं है। दूसरी ओर, प्रशासन की संवेदनहीनता देखिए कि पिता-पुत्र को एक ही ताबूत में दो दिन तक रखा गया। रविवार को दोनों का शव माॅर्चरी में रखवा दिया गया। सोमवार को दोनों का अंतिम संस्कार किया जाएगा। इधर, आरती को जब होश आता है तो बेटे और पति के बारे में ही पूछती है। उसकी नाजुक हालत को देखते हुए उसे बताया जाता है कि वह लोग ठीक हैं। दोनों से फिर मिलने की उम्मीद में वह आंखें बंद कर सो जाती है। डॉक्टरों का कहना है कि आरती को ठीक होने में अभी कुछ दिन और लगेंगे।

आरती को बताया जा रहा है कि सब ठीक-ठाक है

दो उदाहरण ऐसे भी

40 लोगों को धकेलकर बचाया, कंधा टूटा पर हिम्मत नहीं हारी

ये हैं 45 साल के बलजिंदर सिंह। ये भी रेलवे ट्रैक पर खड़े थे। एकाएक इनकी नजर अपनी ओर आती ट्रेन पर पड़ी। बलजिंदर ने ट्रैक से लोगों को बाहर की तरफ धकेलना शुरू कर दिया। इस तरह मरने से बचे हरजीत और शिवपाल ने बताया कि बलजिंदर लोगों को बचाते-बचाते ट्रेन की टक्कर से अपना कंधा गंवा बैठे। अब अस्पताल में भर्ती हैं। पुलिस का कहना है कि बलजिंदर ने करीब 40 लोगों को धकेलकर बचाया।

हादसे में अपना कोई नहीं था, रात को ब्लड देने पहुंचीं 80 वर्षीय रजनी

ये रजनी मल्होत्रा हैं। 80 साल की हैं। इन्हें रात साढ़े आठ बजे हादसे का पता चला। इन्होंने सोचा कि अस्पतालों में घायलों को लाया जा रहा होगा। खून की जरूरत पड़ेगी, इसलिए रात 11 बजे अस्पताल पहुंच गईं। ब्लड डोनेट करने की इच्छा जताई। लेकिन, ज्यादा उम्र की वजह से ये संभव नहीं हो पाया। फिर लोगों की सेवा में जुट गईं।

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