हरि वर्मा
कोरोना से मौत पर सियासत के साथ-साथ विदेशी मीडिया की सनसनी जारी है। उत्तर प्रदेश और बिहार में गंगा में उतराती लाशों, शवों को गंगा किनारे दफनाने और मौत के आंकड़ों को लेकर सवाल तैर रहे हैं। सोशल मीडिया से लेकर अंतर्राष्ट्रीय मीडिया तक गंगा किनारे की डरावनी तस्वीर पसरी हुई है। दूसरी लहर पर विपक्ष का सियासी तूफान भी खड़ा है। टीकाकरण पर राज्य बनाम केंद्र और सरकार बनाम विपक्ष का बखेड़ा जारी है। निश्चित तौर पर यह वक्त इनका नहीं है।
डरावनी तस्वीरों का सच
गंगा किनारे शवों को दफनाने की बात हो या गंगा में उतराती लाशें, ऐसा पहले भी होता रहा है। बात 1985 की है। बिहार का नरमुंड कांड चर्चित हुआ था। तब पटना से प्रकाशित पाटलिपुत्र टाइम्स अखबार की सनसनी के मुताबिक, गंगा किनारे दफनाए जाने वाले शवों से सिर काटकर मानव अंगों (खोपड़ियों) की तस्करी की जाती थी। इसलिए यह नरमुंड कांड कहलाया। यह अखबार वहां के पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र का था। यानी गंगा किनारे अंतिम संस्कार, दफनाने और अकाल मौत की स्थिति में शवों को जल प्रवाहित करने का चलन 30-35 साल पहले भी था। शैव संप्रदाय और कबीरपंथियों के अलावा संपदर्श, कुष्ठ रोग, अकाल मौत और बाल शवों को दफनाने- प्रवाहित करने की परंपरा पुरानी है। गंगा किनारे अंतिम संस्कार की आस्था इसकी वजह है। हां, यह सही है कि स्वाभाविक मौतों के साथ कोरोना महामारी की मौत भी जुड़ती चली गई। मृतकों की संख्या बढ़ने से यूपी से बिहार के कई शहरों वाराणसी, बलिया, उन्नाव, कानपुर, प्रयागराज, बक्सर आदि क्षेत्रों के गंगा तट से शवों की डरावनी तस्वीर देशी-विदेशी मीडिया से लेकर सोशल मीडिया पर छाई हैं।
विदेशी अखबार द गार्जियन, द टेलीग्राफ, वाशिंगटन पोस्ट, न्यूयार्क टाइम्स ने इन डरावनी तस्वीरों का इस्तेमाल सनसनी के तौर पर किया है। मौतों का सनसनीखेज आंकड़ा और आकलन पेश किया है। विदेशी मीडिया का यह रेड फंगस (खून के छींटें) भारत की छवि पर ब्लैक फंगस (काला धब्बा) जैसा है। भारत की छवि दागदार करने की साजिश।
मौत पर आंकड़ों की बाजीगरी
देश में मौत के आंकड़ों पर सवाल उठ रहे हैं। विपक्ष के साथ-साथ विदेशी मीडिया आंकड़ों का डरावना ग्राफ पेश कर रहा है। लैसेंट ने तो यहां तक अंदेशा जता दिया कि अगस्त तक भारत में मौत का आंकड़ा दस लाख पार कर जाएगा। इसके उलट राहत वाला आंकड़ा यह है कि दूसरी लहर में 44 दिन बाद 28 मई को कोरोना के सबसे कम 1 लाख 86 हजार 364 नए मामले सामने आए, वहीं इससे कहीं ज्यादा 2 लाख 59 हजार 459 मरीज ठीक भी हुए।
विदेशी मीडिया न्यूयार्क टाइम्स ने तो सीरो सर्वे को ही आधार मानकर भारत में वास्तविक मौत को तेरह गुना ज्यादा मानते हुए 42 लाख मौत का भयावह अनुमान लगा लिया। विदेशी मीडिया और विपक्ष लगातार ऐसे आंकड़े प्रस्तुत कर रहा है। ये डरावने आंकड़े संक्रमितों के हौंसले कमजोर करते हैं।
आंकड़े नहीं वायरस दबाने का सच
विदेशी मीडिया में गंगा किनारे की वह तस्वीर पेश की गई है जिसमें शवों से रामनामी खींचते दिखाया गया है या रेत-मिट्टी डालते। दरअसल, यूपी-बिहार सीमा पर जब गंगा में कुछ शव उतराते नजर आए, तो संक्रमण रोकने के लिहाज से शवों पर रेत-मिट्टी डाली गई। दरअसल, ये मौत के आंकड़े नहीं, वायरस दबाये जा रहे थे। मानसून भी सिर पर है और याश की बारिश में गंगा का जलस्तर बढ़ना स्वाभाविक है। ऐसे में उफनाती गंगा के आसपास दफनाए शवों के नदी में उतराने का खतरा भी रहता। फिर यह भी साफ नहीं कि पानी से संक्रमण फैलता है या नहीं क्योंकि अभी लखनऊ के सीवर में संक्रमण पाया गया। यूं भी कुंभ के बाद पानी में संक्रमण को लेकर अलग-अलग अध्ययन जारी है। मेडिकल के जानकार मानते हैं कि मौत के 24 घंटे बाद ही मुंह-नाक से ब्लैक फंगस या अन्य संक्रमण के खत्म होने की संभावना रहती है। जहां तक रामनामी हटाने का सवाल है, संक्रमण से मौत पर कुछ मामलों में जब परिजनों के ही मुंह फेर लेने की खबरें आ रही हैं, तो भला कौन गैर लाशों से रामनामी हटाने का जोखिम लेगा। उसे खुद का खतरा भी तो है। विदेशी मीडिया में अनुमानित परोसा जा रहा मौत का आंकड़ा चाहे जितना भयावह हो लेकिन जमीन पर उम्मीद जिंदा है।
डर के आगे जीत की उम्मीद
इन डरावने आंकड़ों के बीच डर के आगे जीत की उम्मीद जगी है। आंकड़ों के मुताबिक, 20 मार्च 2020 से 28 मई 2021 तक दोनों लहरों के दौरान अब तक 3 लाख 18 हजार 895 लोगों की मौत हुई है। कुल दो करोड़ 75 लाख 55 हजार 457 बीमार संक्रमित हुए तो इनमें से दो करोड़ 48 लाख 93 हजार 410 स्वस्थ्य भी हुए। 23 लाख 43 हजार 152 मरीजों का इलाज चल रहा है। उम्मीद जगाता आंकड़ा यह भी है कि कोरोना से मृत्यु दर 1.15 फीसदी है जबकि रिकवरी रेट 90.34 फीसदी। जाहिर है संक्रमण से लड़कर जीतने वाले ज्यादा हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या यह वक्त संक्रमण से मिलकर लड़ने का है या सियासी उठापटक का। टीकाकरण को लेकर सवाल उठना लाजिमी है लेकिन सरकार का दावा है कि दिसंबर तक देश में सभी को टीके लगा दिए जाएंगे। टीकाकरण में भारत दुनिया में अभी तीसरे नंबर पर है। यदि दिसंबर तक सभी को टीके का लक्ष्य पूरा कर लिया जाता है तो सबसे तेजी से दुनिया में टीकाकरण के लिए भारत पहले पायदान पर पहुंच जाएगा। ऐसे में टीके को लेकर शुरू से ही सवाल खड़े करना, टीके के साथ मौत के आंकड़ों पर सियासी उलझन पैदा किया जाना शर्मनाक है। इन उलझनों से दूर हमें मुंह पर मास्क, दो गज की
दूरी और बार-बार हाथ धोने का मंत्र याद रखना है। आएं मिलकर लड़ें, जीतें। … क्योंकि डर के आगे जीत है।
