हर साल गर्मी में कहर बरपाने वाली एईएस (एक्यूट इंसेफ्लाइटिस सिंड्रोम) के प्रति जिम्मेदार संवेदनहीन हैं। मरीजों को अस्पताल पहुंचाने के लिए एंबुलेंस की जगह ई-रिक्शा व ऑटो की व्यवस्था की गई है। इस भीषण गर्मी और लू मेें मरीज इन वाहनों में कितना सुरक्षित रहेेंगे, समझा जा सकता है। कम बीमार मरीज की हालत जहां बिगड़ जाएगी, वहीं गंभीर मरीज तो दम ही तोड़ देंगे। इस तरह की व्यवस्था को लेकर सिविल सर्जन ऊपर से आए आदेश को जिम्मेदार मान रहे हैं।

एईएस मरीजों को समय से स्वास्थ्य केंद्रों तक पहुंचाने के लिए पंचायत स्तर पर गाडिय़ों की टैगिंग करने के लिए स्वास्थ्य विभाग ने जिला परिवहन पदाधिकारी को पत्र लिखा था। इस पर परिवहन विभाग ने 1521 वाहनों की सूची स्वास्थ्य विभाग को दी है। इनमें 15 एंबुलेंस के अलावा 1506 ई-रिक्शा व ऑटो हैं। ई-रिक्शा व ऑटो में न तो ऑक्सीजन की व्यवस्था रहेगी, न ही स्लाइन की। ऐसे वाहन से मरीज अस्पताल कैसे पहुंचेेंगे, यह बड़ा सवाल है।

सिविल सर्जन डा. संजय कुमार चौधरी का कहना है कि विभागीय निर्देश के अनुसार मुख्यमंत्री ग्राम परिवहन योजना के तहत बेरोजगारों को अनुदान पर जो वाहन उपलब्ध कराएं गए हैं, उन्हें संदिग्ध एईएस मरीजों के उपयोग लिया जाना है। इस कारण परिवहन विभाग को ऐसे वाहनों की सूची देने के लिए पत्र लिखा गया था। संदिग्ध एईएस मरीज को तत्काल प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में भर्ती कराने के लिए ऐसे वाहनों को टैग किया गया है। स्थिति गंभीर होने पर उसे एंबुलेंस से सदर अस्पताल, दरभंगा मेडिकल काॅलेज एवं अस्पताल या श्री कृष्ण मेडिकल काॅलेज एवं अस्पताल, मुजफ्फरपुर भेजा जाएगा। इसके लिए जिले में 47 सरकारी एंबुलेंस हैं। इनमें पांच खराब हैं। उनकी मरम्मत कराई जा रही है।
जिला परिवहन पदाधिकारी राजेश कुमार का कहना है कि स्वास्थ्य विभाग से मिले पत्र के आधार पर जिले में उपलब्ध प्रखंडवार एंबुलेंस के अतिरिक्त ई-रिक्शा और ऑटो की सूची उपलब्ध कराई गई है। ये सभी वाहन मुख्यमंत्री ग्राम परिवहन योजना के तहत बेरोजगारों को अनुदान पर उपलब्ध कराए गए हैं। मरीज ले जाने पर विभागीय दर पर भुगतान स्वास्थ्य विभाग की ओर से किया जाएगा।

