पश्चिम चंपारण। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सोच को पश्चिम चंपारण के किसान आगे बढ़ा रहे हैं। वे खेतों में नैनो यूरिया (तरल यूरिया) को अपनाने पर जोर दे रहे हैं। पिछले महीने गुजरात के गांधीनगर में नैनो उर्वरक कारखाने के उद्घाटन के मौके पर उन्होंने यूरिया पर निर्भरता को कम करने के लिए इसे बेहतर विकल्प बताया था। इस पर जिले में किसानों का नैनो यूरिया के प्रति रुझान बढ़ा है।
सूबे में तरल यूरिया का सबसे पहले प्रत्यक्षण पश्चिम चंपारण में 2020 में किया गया था। इसमें माधोपुर कृषि विज्ञान केंद्र के निर्देशन में 40 किसानों ने धान की फसल में इसका इस्तेमाल किया था। वर्ष 2021 में बाजार में लांच होने के बाद किसानों ने इसका इस्तेमाल शुरू कर दिया।
लौरिया के सिसवनिया निवासी किसान शैलेश कुमार सिंह व प्रवेश कुमार सिंह बताते हैं कि नैनो यूरिया के इस्तेमाल से धान में ज्यादा हरियाली आई और सामान्य यूरिया से खर्च भी कम रहा। सामान्य यूरिया की 50 किलो की बोरी के लिए किसानों को 262 रुपये खर्च करने पड़ते हैं, वहीं 500 एमएल नैनो यूरिया के लिए 240 रुपये ही लगते हैं। यह 50 किलो यूरिया के बराबर काम करता है।
इफको के मुख्य प्रबंधक गिलबर्ट फिलिप के अनुसार, रबी की खेती के दौरान जिले में निर्धारित लक्ष्य 60 हजार बोतल की जगह 66 हजार बोतल की बिक्री हुई थी। इस बार इफको ने खरीफ के लिए एक लाख बोतल का लक्ष्य रखा है।
कृषि विज्ञानी धीरू तिवारी बताते हैं कि सामान्य यूरिया का खेतों में 100 प्रतिशत लाभ नहीं मिल पाता है। एक तिहाई मात्रा ही पौधों को मिल पाती है। नैनो उर्वरक के उपयोग से ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी होने के साथ-साथ इसका असर पर्यावरण पर अनुकूल पड़ेगा। मिट्टी की सेहत भी बरकरार रहेगी। नैनो यूरिया आने से किसान आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ेंगे। जिले में अब तो नैनो डीएपी भी किसानों को उपलब्ध कराई जा रही है। प्रयोग के तौर पर कुछ किसानों ने रबी की फसल पर इसका इस्तेमाल किया था। इसमें सफलता मिली है।
