राजीवनगर के नेपाली नगर में आवास बोर्ड की जमीन से अतिक्रमण हटाओ अभियान का दूसरा दिन। दिनभर बुलडोजर गड़गड़ाते रहे। दो दिन में 100 से अधिक मकान टूटे और 50 एकड़ जमीन पर प्रशासन का कब्जा हो गया। अगर हाईकोर्ट ने रोक नहीं लगाता तो दोगुने मकान टूटते। जिनके घर पर बुलडोजर चलता, वे रोने लगते। फिर गम, गुस्सा और आंखों में आंसू लिए किसी तरह सामान समेट कर बाहर निकलते।

लोगों का कहना था कि जब मकान बना रहे थे, तब पुलिस ने क्यों नहीं रोका? ये तो तानाशाही है। दानापुर दियारा के उपेंद्र सिंह ने कहा-यूपी में माफिया पर, लेकिन यहां ताे जनता के सपनों पर बुलडोजर चलाया जा रहा है। बिहारशरीफ की सुनीता देवी दूसरे के घरों में छोटे-मोटे काम करती थी और पति प्रदीप कुमार ट्यूशन पढ़ाते थे। किसी तरह पैसे जोड़कर आधा कट्ठा जमीन में घर बनाया। तीन दिन पहले ही गृहप्रवेश किया था।

तीसरे दिन ही मकान टूट गया। दोनों लगातार रोए जा रहे थे। कहा-बेटी जवान है और बेटा बेरोजगार। कुछ दिन रिश्तेदार के यहां रहेंगे। आगे क्या होगा, कुछ पता नहीं। सोनपुर की संगीता सिंह के पति रामकुमार सिंह सीआरपीएफ में हैं और बेटी प्रियंका लखनऊ में डायमंड कंपनी में मैनेजर। मां-बेटी रो रही थीं। कहने लगीं-50 लाख खर्च कर मकान बनाए थे, सब तबाह हो गया।

राजद नेत्री कंचन सिंह के चार मंजिले व्हाइट हाउस पर भी बुलडोजर चल रहा था। सामान निकलवा रहे उनके पति के बहनोई पंकज सिंह परेशान थे कि सामान कैसे निकाले हर जगह बुलडोजर से रास्ता बंद है। आरा एकवना के कामेश्वर सिंह का पूरा परिवार सामान बाहर निकालने में लगा था। बताया कि 35 लाख लगे थे, सब पानी में बह गया। कल से घर में खाना भी नहीं बना है।

मर जाऊंगी यहीं, कहीं नहीं जाऊंगी
हम तो बेघर हो गए आपका क्या…?
कोतवाली थाने से रिटायर्ड दारोगा आरएस सिंह भोजपुर के रहने वाले हैं। 2017 से नेपाली नगर में घर बना कर रह रहे हैं। बताया कि प्रमोद सिंह नामक व्यक्ति से जमीन लिए थे और ब्रोकर थे अश्विनी सिंह और मनोज सिंह। तभी उनकी पत्नी बोली कि हमलोग तो बेघर हो गए अब अखबार में छाप कर क्या कीजिएगा?

बलिया के त्रिलोकी सिंह 1984 में जमीन लिए थे निराला कोऑपरेटिव से। उस समय 4 हजार रुपए कट्ठा जमीन लिए थे। उसके बाद किसान से सपोर्टिंग पेपर लेकर जमीन का मोटेशन कराया और हाजीपुर में रजीस्ट्री कराई।

फिर 1993 में मकान बनाकर रहने लगे। एक बाद बूटा सिंह के समय भी बुलडोजर आया था, तब महिलाओं ने आगे बढ़कर लौटने पर मजबूर कर दिया था। अब मकान खाली करने को कहा जा रहा है। सरासर गलत है प्रशासन की कार्रवाई। दवा कंपनी में मैनेजर राजीव रंजन ने 1986 में 5 हजार वर्गफीट जमीन ली थी निराला कोऑपरेटिव से। 1994 में मकान बनाकर रहने लगे। कभी कोई समस्या नहीं आई और अब मकान तोड़ने की है तैयारी। क्या करें समझ में नहीं आ रहा है।