अंग प्रदेश की प्रसिद्ध विषहरी पूजा संपन्न:मृ’त पति को जीवित कराने स्वर्गलोक निकली थी सती बिहुला

भागलपुर के चंपानगर स्थित मां मनसा देवी के मुख्य मंदिर से देर रात विषहरी मां की प्रतिमा कड़ी सुरक्षा के बीच नम आंखों से विसर्जित की गई। इस दौरान काफी संख्या में पुलिस बल तैनात थी। चंपानगर मनसा देवी मंदिर से प्रतिमा को श्रद्धालुओं ने अपने कंधे पर लेकर चंपा नदी में विसर्जन किया। इस तरह सती बिहुला अपने मृत पति बाला लखेन्द्र को लेकर केला के थम पर सवार होकर गंगा के रास्ते से जीवित कराने के लिए स्वर्गलोक निकली।

मृत पति को जीवित कराने स्वर्गलोक निकली थी सती बिहुला; जानें पूरी कहानी | Sati  Bihula had come out to heaven to bring the dead husband alive; Know the  full story -

यह है विषहरी पूजा से जुड़ी कहानी
अंग की लोकगाथा के मुताबिक बाला-बिहुला-विषहरी पूजा का चंपा नगरी में उद्भव स्थल है. यहीं पर माता विषहरी को सती बिहुला के कारण ख्याति प्राप्त हुई. शंकर भगवान की दत्तक पुत्री विषहरी माता उनकी तरह ही ख्याति प्राप्त करना चाहती थी. इसे लेकर भगवान शंकर से अपनी मंशा जाहिर की.

भगवान शंकर ने उन्हें बताया कि अंग प्रदेश में मेरा एक भक्त चांदो सौदागर है. अगर वो तुम्हारी पूजा श्रद्धा भाव से कर लेता है, तो तुम्हें ख्याति मिल जाएगी । विषहरी ने शिव भक्त चांदो सौदागर से अपनी पूजा करने के लिए जिद्द की। लेकिन सौदागर ने पूजा करने से मना किया तो विषहरी ने सर्प डंस से उसके परिवार का नाश करना शुरू किया।

सौदागर के अंतिम पुत्र बाला लखेन्द्र की शादी बिहुला से हुई। शादी के दिन एक लोहे का घर बनाया गया, जिसमें सुरक्षा को लेकर हवा आने की सुई भर का छेद था। इसके बाबजूद विषहरी ने किसी तरह महल के अंदर प्रवेश कर बाला लखेन्द्र को डंस लिया। मृत बाला लखेन्द्र को जीवित कराने के लिए सती बिहुला केले के थम पर सवार होकर गंगा के रास्ते स्वर्गलोक निकल पड़ी थी और उससे जीवित कर वापस लाया था।

तबसे ही चांदो सौदागर ने बाएं हाथ से विषहरी की पूजा करना शुरू किया था। चंपानगर में मनसा देवी का मुख्य मंदिर है, जहां हर साल 17 अगस्त को विषहरी पूजा की जाती है।

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