दिवाली के अगले दिन कार्तिक प्रतिपदा पर बलि प्रतिपदा पर्व मनाया जाता है. बलि प्रतिपदा को बलि पूजा भी कहा जाता है, जो गोवर्धन पूजा के साथ आता है. ये पर्व भगवान श्रीकृष्ण और गिरिराज जी को समर्पित है. बलि प्रतिपदा पर राजा बलि की पूजा का विधान है. राजा बलि को भगवान विष्णु से अमर होने का वरदान प्राप्त है. ऐसे में कहा जाता है कि इनकी पूजा करने से जीवन में सुख-समृद्धि आती है और हर कार्य सिद्ध होते हैं. यूं तो राजा बलि की पूजा दक्षिण भारत में ओणम के समय होती है. परंतु, उत्तर भारत में कार्तिक प्रतिपदा के दिन राजा बलि की पूजा करने का विधान है. लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं राजा बलि कौन थे और बलि प्रतिपदा का पर्व क्यों मनाया जाता है? तो चलिए जानते हैं दिवाली के अगले दिन बलि प्रतिपदा पर्व मनाने के पीछे क्या महत्व है.
बलि प्रतिपदा पर्व का महत्व
भगवान विष्णु के अवतार वामन की राक्षस राजा बलि पर विजय और उनके धरती पर आगमन पर यह त्योहार मनाया जाता है. इसके पीछे एक पौराणिक कथा भी प्रचलित है, जिसके अनुसार, एक बार भगवान विष्णु के अवतार वामन ने राजा बलि से तीन पग भूमि की मांग की थी. इस पर उन्होंने दो पग में ब्रह्मांड और पृथ्वी को माप लिया था. इसके बाद जब वामन ने बलि से पूछा कि वो अपना तीसरा पग कहां रखें तो बलि ने अपना सिर उनके चरणों में रख दिया.
मान्यता है कि जैसे ही बलि ने अपना सिर वामन के चरणों में रखा और वामन ने उनके सिर पर पैर रखा तो वे पाताल लोक पहुंच गए. उस समय भगवान ने प्रसन्न होकर बलि को आशीर्वाद दिया कि प्रतिपदा को तुम्हारी पूजा होगी और इसे उत्सव के रूप में मनाया जाएगा. तब से ही बलि की पूजा की परंपरा शुरू हुई. ऐसा माना जाता है कि राजा बलि इस दिन धरती पर निवास करने आते हैं और भक्तों की पुकार सुनते हैं.





