मुजफ्फरपुर: वह आता, दो टूक कलेजे को करता, पछताता पथ पर आता, पेट-पीठ दोनों मिलकर हैं एक, चल रहा लकुटिया टेक, मुट्ठी भर दाने को, भूख मिटाने, मुंह फटी-पुरानी झोली फैलाता…दिल को झकझोरने वाली ये पंक्तियां कविवर सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने रची थी। दुर्भाग्यवश ये उस वक्त भी समीचीन थी और अब भी यथार्थ ही हैं।
सांसों संग मानवता भी लील गई मौत
एक भिक्षुक, जो जीते जी तो लोगों की तिरस्कृत भावना तो झेलता ही है, जीवन के बाद मृत्यु भी शायद उसकी यातना और पीड़ा को कम नहीं कर पाती। इस भौतिकवादी युग में लोग इस कदर पत्थर से हो गए हैं, मानो सांसों संग मानवता भी लील चुकी है मौत। जी हां, जहां से हुक्मरानों की फौज, बड़े प्रशासनिक अधिकारियों का अमला गुजरता हो और एक भिक्षुक का शव अंतिम पड़ाव तक न पहुंच रहा हो, तो मानवीय संवेदना पर प्रश्न तो उठेंगे ही।
थाने से चंद कदमों पर 18 घंटे से पड़ा भिक्षुक का शवशहर के अहियापुर थाने से चंद कदमों की दूरी पर जीरोमाइल चौक के समीप एक भिक्षुक का शव रविवार की सुबह छह बजे से पड़ा है। शव की पथराई आंखें मानो कई सवाल पूछ रही हैं, लेकिन…। सड़क किनारे शव देख कुछ लोगों ने इसकी सूचना अहियापुर थाने की पुलिस को दी भी, लेकिन देर रात समाचार भेजे जाने तक कोई नहीं पहुंचा। गश्ती पदाधिकारी रास्ते से गुजरे जरूर, लेकिन वे रुके नहीं। 18 घंटे से शव वहीं पड़ा है।
सूचना पर भी नहीं पहुंची पुलिस
स्थानीय लोगों ने बताया कि अहियापुर थाने की पुलिस एंबुलेंस भेजने की बात कह तो रही थी, लेकिन देर रात तक नहीं भेजी गई। इससे इलाके के लोगों में आक्रोश है। शव के पास कुत्ते मंडरा रहे थे। किसी भी सभ्य समाज के लिए यह घटना मानवता को शर्मसार करने वाली है।
रात पौने बारह बजे अहियापुर थानाध्यक्ष का पक्ष जानने के लिए सरकारी मोबाइल पर दो बार कॉल किया गया, लेकिन रिसीव नहीं हुआ। तीसरी कॉल पर थाने के ओडी पदाधिकारी एएसआइ सुशील कुमार ने कहा कि सूचना मिलने के बाद दूर-दूर तक पुलिस पहुंच जाती है। थाने के बगल में पुलिस नहीं जाएगी, ऐसा होगा क्या। फिर उन्होंने कहा कि ओडी में जब से वे आए हैं, तब से उन्हें इस तरह का कोई कॉल नहीं आया है। फिर भी गश्ती दल को भेजते हैं।


