बिहार में निषाद वोट बैंक पर दावेदारी की होड़ मगर असली नेता कौन

पटना. राष्ट्रीय जनता दल ने महागठबंधन में सहयोगी दलों के साथ सीट शेयरिंग में मुकेश साहनी की विकासशील इंसान पार्टी के साथ जब से समझौता किया है उसी समय से बिहार में निषाद वोटों को लेकर खींचतान शुरू हो गई है. राष्ट्रीय जनता दल मुकेश साहनी की पार्टी वीआईपी को गोपालगंज और झंझारपुर के अलावा मोतिहारी सीट अपने कोटे से दी हैं. मुकेश सहनी से समझौते के बहाने राष्ट्रीय जनता दल की नजर निषाद वोट बैंक पर है. राष्ट्रीय जनता दल को पता है कि मुकेश सहनी और उनकी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल के लिए तुरुप का पत्ता साबित हो सकते हैं. यही नहीं जदयू और भाजपा के उम्मीदवारों के लिए मुकेश साहनी की पार्टी सिरदर्द भी साबित हो सकती है.

दरअसल, बिहार की राजनीति में सन ऑफ मल्लाह के नाम से खुद को प्रचारित करने वाले मुकेश साहनी शुरुआती दिनों से लेकर अब तक मल्लाहों की राजनीति करते आ रहे हैं. मुकेश साहनी ने निषादों के लिए आरक्षण की मांग को अपना मुद्दा बनाया और फिर धीरे-धीरे खुद को राजनीति में स्थापित कर लिया. बिहार में मल्लाहों की करीब दो दर्जन उपजातियां हैं. एक अनुमान के अनुसार, बिहार के वोट बैंक पर निषादों का हिस्सा ढाई प्रतिशत से कुछ ही अधिक है, लेकिन निषादों की सभी 15 उपजातियों को मिलाकर यह तकरीबन 8 से 9% है.  बिहार जाति जनगणना रिपोर्ट में इन उपजातियों की आबादी अलग-अलग बताई गई है.

निषाद वोटबैंक पर खींचतान नई बात नहीं
दरअसल, बिहार में निषाद वोट बैंक को लेकर खींचतान कोई नई बात नहीं है. भाजपा हो जदयू या फिर राष्ट्रीय जनता दल, सभी निषाद वोट को अपने पाले में करने की जुगाड़ हर चुनाव में करते हैं. वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव की बात करें तो भाजपा हरि साहनी के चेहरे को आगे रखकर निषाद वोट बैंक को अपने पाले में करना चाह रही है, वहीं जदयू मदन साहनी के नाम पर निषाद वोट बैंक को लुभाने का प्रयास में लगी हुई है. 2020 के विधानसभा चुनाव के दौरान भी राष्ट्रीय जनता दल ने मुकेश सहनी से समझौता किया था, लेकिन उन्हें चुनाव मैदान में उतारने का वादा नहीं किया था. लेकिन, सीटों की तालमेल की वजह से बात बिगड़ गई और मुकेश साहनी ने राष्ट्रीय जनता दल पर विश्वासघात करने का आरोप लगाकर महागठबंधन छोड़ दिया था.

मुकेश सहनी को अभी काफी कुछ साबित करना है
राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो मुकेश साहनी ने भले ही खुद को निषादों का नेता घोषित किया हो, लेकिन राजनीतिक सफलता के दृष्टिकोण से देखा जाए तो वह कुछ खास अर्जित नहीं कर सके हैं. कुछ उपचुनावों में उन्होंने वोटों का जो प्रतिशत हासिल किया, उससे उनके विरोधियों की हालत पतली जरूर हुई है. जहां तक जदयू जदयू की बात है तो विश्लेषकों की नजर में भले उनके पास मदन सहनी जैसा चेहरा है, लेकिन अति पिछड़ा वोट बैंक पर नीतीश कुमार की पकड़ होने का फायदा भी जदयू को मिलता रहा है इस बात से इनकार नहीं किया सकता. वहीं, भाजपा ने भी बदलते हुए समय में जो रणनीति तैयार की है उसमें अति पिछड़ा वोट बैंक पर उसकी पैनी नजर है. भाजपा हरि सहनी जैसे नेताओं को आगे कर उसने इस वोट बैंक पर पकड़ बनाई है.

निषाद वोट बैंक पर दावेदारी की होड़ में लीडर की तलाश 
राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं, मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में मुकेश सहनी भले ही खुद को सन ऑफ मल्लाह कहते हों. अपने प्रतिद्वंदियों से उनका चेहरा  बड़ा होना अलग बात है, लेकिन निषाद वोट बैंक पर इनका एकाधिकार स्थापित हो गया हो ऐसा नहीं है. सच तो यह है कि मुकेश साहनी का अभी लिटमस टेस्ट चल रहा है. 2024  और 2025 के लोकसभा और विधानसभा चुनाव में उनकी सफलता बहुत कुछ उनके भविष्य की राजनीति तय करेगी.

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