विशेष रिपोर्ट: प्रकाश सिन्हा (संपादक) की कलम से।
भारत के राजनीतिक इतिहास में कई प्रधानमंत्री आए और गए, लेकिन बहुत कम नेताओं ने इतने अल्पकालिक कार्यकाल में इतनी गहरी छाप छोड़ी जितनी लाल बहादुर शास्त्री जी ने। महज 19 महीने का कार्यकाल, पर देश की दिशा और दशा बदल देने वाला। आज जब ‘आपातकाल’ के 19 महीनों की चर्चा होती है, तब इससे कहीं अधिक सकारात्मक और निर्णायक शास्न काल की बात करना प्रासंगिक है — शास्त्री जी का काल।

नेतृत्व में स्थिरता और स्पष्टता:
लाल बहादुर शास्त्री ने 1964 में पंडित नेहरू के निधन के बाद प्रधानमंत्री का पद संभाला। यह समय अत्यंत संवेदनशील था — देश आंतरिक और बाहरी चुनौतियों से जूझ रहा था। 1965 में पाकिस्तान के साथ युद्ध हुआ, जो शास्त्री जी के नेतृत्व और कूटनीतिक कौशल की असली परीक्षा थी। उनके “जय जवान, जय किसान” नारे ने पूरे देश को एकता के सूत्र में बांध दिया।

नीतियों में स्पष्ट दिशा:
शास्त्री जी की सबसे बड़ी विशेषता थी उनकी सादगी, दृढ़ निश्चय और जनता से जुड़ाव। उन्होंने खाद्यान्न संकट के समय खुद उपवास रखकर देशवासियों को प्रेरित किया। उनकी नीतियां जनता के हित में केंद्रित थीं, न कि सत्ता की मजबूती के लिए। भले ही कार्यकाल छोटा रहा, लेकिन उन्होंने वह किया जो बड़े-बड़े नेता दशकों में नहीं कर पाते।

ताशकंद समझौता और शांति की राह:
पाकिस्तान के साथ युद्ध के बाद ताशकंद में उन्होंने एक ऐतिहासिक समझौते पर हस्ताक्षर किए, जिसे उनके निधन से कुछ घंटे पहले अंतिम रूप दिया गया। यहीं पर उनका आकस्मिक निधन हो गया, जो आज भी रहस्य बना हुआ है। लेकिन यह समझौता शांति स्थापना की दिशा में एक बड़ा कदम था।

इतिहास की अनदेखी धरोहर:
आज जब हम आधुनिक भारत की बात करते हैं, तो अक्सर हम शास्त्री जी के योगदान को भूल जाते हैं। उनके कार्यकाल में लिए गए निर्णयों ने आज के भारत की नींव रखी। उन्हें सिर्फ एक ‘बीच का प्रधानमंत्री’ समझना एक बड़ी ऐतिहासिक भूल है।

लाल बहादुर शास्त्री का 19 महीनों का कार्यकाल सिर्फ समय की दृष्टि से छोटा हो सकता है, लेकिन उसकी गूंज आज भी देश की नीतियों, राजनीति और जनता की सोच में सुनाई देती है। यह समय है कि हम उन महीनों की पुनर्समीक्षा करें और उस नेता को वह स्थान दें, जिसके वे सही मायनों में हकदार हैं।


